बिहार में करोड़ों खर्च के बावजूद गंगा जल का स्तर अत्यंत ख़राब, गंगाजल पीना तो दूर, नहाने लायक भी नहीं भी नहीं रह पाया

गंगा भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी है। जिसे ना सिर्फ नदी बल्कि देवी अर्थात माता का दर्जा भी दिया गया है। साथ ही साथ ना सिर्फ प्राकृतिक संपदा बल्कि जन जन की भावनात्मक आस्था से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन इतनी अनन्य आस्था श्रद्धा होने के बावजूद भी गंगा में फैली गंदगी को अब तक काम नहीं किया जा सका है। गंगा का जल अत्यंत ही गुणकारी है और इसके शुद्धिकरण की क्षमता इसमें खुद है। तब भी इस अनुपम शुद्धीकरण क्षमता तथा सामाजिक श्रद्धा के बावजूद इस को प्रदूषित होने से नहीं रोका जा पा रहा है। हालांकि इसके प्रयत्न जारी है। सफाई की अनेकों योजनाएं भारत सरकार द्वारा भी कार्यरत है।

पटना का ड्रेनेज सिस्टम हो गया है 200 वर्षों से भी पुराना बिहार के सापेक्ष से गंगा की बात की जाए तो यहां भी सफाई परियोजनाएं क्रियान्वयन में है। उसके बावजूद गंगा का पानी पीने तो दूर की बात अब नहाने के लायक भी नहीं रह पाया है। गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने के लिए पैसे पानी की तरह खर्च किए जा रहे हैं। उसके बावजूद गंदगी का स्तर बढ़ता ही जा रहा है। हाल ही में बिहार विधानसभा में सी ए जी की एक रिपोर्ट पेश की गई जिससे पता चलता है कि पैसे खर्च होने के बावजूद भी गंगा में सफाई का स्तर कुछ खास नहीं है।सी ए जी द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार पूर्वी भारत में कोलकाता के बाद पटना के शहरी क्षेत्र का ड्रेनेज सिस्टम ही सबसे पुराना है जो करीब 200 वर्षों से भी ज्यादा का हो चुका है और अब काफी खराब स्थिति में है। बिहार में प्रदूषण के प्राथमिक स्रोत गंगा नदी के तट पर स्थित शहरों से बहाए गए मल, घरेलू अपशिष्ट पदार्थ तथा गंदे जल का आना है। इन सब का नतीजा यह है कि बिहार में गंगा का पानी नहाने लायक भी नहीं रह गया है।

कैग की रिपोर्ट से हुआ खुलासा बिहार में पानी का गुणवत्ता स्तर हो गया है काफी खराब बिहार में सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी होने की वजह से वर्ष 2016-17 में मैक्सिमम टोटल कॉलीफॉर्म (TC)और फिकल कॉलीफॉर्म (FC)का स्तर 9000 mpn/100ml और 3100mpn/100ml से बढ़कर 2019-20 में 160,000 mpn/100ml TC और FC का हो गया है।जिससे स्पष्ट रूप से पता चल रहा है कि पानी की गुणवत्ता के स्तर में कितनी खराबी हो गई है। समानता माना जाता है कि पीने के पानी में फीकल कॉलीफॉर्म की मात्रा शून्य होनी चाहिए, जबकि पानी में टोटल कॉलीफॉर्म और अर्थात टी एस की मात्रा समान रूप से 100ml में 10ml से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।

सीवरेज सिस्टम ठीक करने वाली कंपनी ने अब तक नहीं किया है फण्ड का इस्तेमाल, डेडलाइन से ज्यादा वक्त में आधा काम भी पूरा नहीं राजधानी पटना में बिहार स्टेट गंगा रिवर कंजर्वेशन एंड प्रोग्राम मैनेजमेंट सोसायटी को सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए 4 वित्त वर्ष में 684 करोड रुपए का इस्तेमाल करने के लिए दिया गया था। लेकिन अब तक काम की रफ्तार इतनी सुस्त है कि पैसों का इस्तेमाल ही नहीं किया गया है। कंपनी के सेविंग अकाउंट मे 683.10 करोड़ रुपये अभी बेकार पड़े हैं। वर्ष 2016-17 से 2019-20 के बीच केवल 16 फ़ीसदी से 17 फ़ीसदी के लगभग ही फंड का इस्तेमाल हो पाया है।

नामानि गंगे परियोजना से बिहार में होनी थी 445 किलोमीटर गंगा घाट की सफाई आदेशों के बावजूद गंगा की सफाई में बिहार काफी पीछे चल रहा है। गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए एक भी ठोस कदम को सही तरीके से क्रियान्वित नहीं किया जाता रहा है। गंगा सफाई व सौंदर्यीकरण के नाम पर बस प्रोजेक्ट बनाने ही रह गए हैं। नमामि गंगे परियोजना के तहत बिहार में लगभग 445 किलोमीटर तक गंगा घाटों की सफाई और सौंदर्यीकरण किया जाना था जो कि अब तक पूरा नहीं हो पाया है। गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए आम नागरिकों का जागरूक होना भी सबसे ज्यादा जरूरी है।घाटों पर लगे एनजीटी डस्टबिन, शौचालय का प्रयोग करना,अपशिष्ट को प्रवाहित नहीं करना भी जरूरी है। प्रत्येक व्यक्ति का यह मौलिक दायित्व है। अगर सभी इतनी समझदारी रखेगे तभी माता का दर्जा दी जाने वाली गंगा नदी फिर से अपने मौलिक स्वरूप में वापस आ पाएगी।

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